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दिमाग घोड़ा है तो दिल उसका लगाम
कई बार मैंने देखा है कि जब आदमी की परिस्थितियां ठीक नही होती, या वह थोडी आर्थिक, सामाजिक या कई अन्य जैसे कि स्वास्थ्य या कुछ पारिवारिक समस्यावों से ग्रसित होता है, तो थोड़ा वह निराशावादी हो जाता है. और यदि ये परेशानिया कुछ लंबे समय तक उसके साथ रह गयी तो फ़िर वह अवशाद से ग्रसित होने लगता है. उसे कई बार समझ में ही नही आता कि यह सब उसी के साथ क्यो हो रहा है? फ़िर रोज रोज यदि वही चीजे दुहराई जाती रहे तो , वह इतना परेशान हो जाता है कि सोचता है ऐसे रोज रोज घुट घुट के जीने से क्या फायेदा? ऐसे में उसे जो सबसे आसान तरीका लगता है अपनी समस्याओं के हल का , वह होता है अंध विश्वास का , पूजा, पाठ, और मन्दिर मस्जिद. फ़िर उसको याद आती है आज के चर्चित बाबावों एवं ज्योतिषियों की. आज के तथा कथित बाबा लोग अपने प्रवचन से उसे और भी गुमराह कर देते है. कही कोई उसे भूत प्रेत भगाने का उपाय सुझाता है, तो कुछ बड़ बोले वास्तुविद उसे सुझाव दे डालते है , जैसे कि आपके मकान के इशान में वास्तु दोष है. या किसी प्रेत ब्रह्म का वाश है आपके घर में... वगैरह वगैरह.. मित्रो ऐसे ही यदि किसी समस्या से आप परेशान हो तो मेरी एक छोटी सी सलाह मानिये. मै यह तो नही कहता कि तुंरत आपकी समस्या दूर हो जायेगी... लेकिन आपका जुझारू पन बढ जाएगा...आपके शरीर में दो स्थान सबसे सक्तिशाली है , पहला है आपका दिल और दूसरा है आपका दिमाग. इन्सान का दिल बहुत ही कोमल भावनाओ को जन्म देता है. ये कोमल भावनाए ही उसे जीने में मदद करती है, जैसे कि प्रेम , विस्वास , अपनापन, भाउकता, और कभी किसी से नाराज हो जाए तो नफ़रत की भी भावना भी इसी दिल में पैदा होती है. हमारी दूसरी ताकत है हमारा दिमाग या मस्तिस्क. दिल तो कोमल भावनाए या कोमल तरंगो को ही जन्म देता है, लेकिन उन कोमल भावनाओ के बारे में सोचने और दिशा देने का काम यही हमारा दिमाग करता है. यदि आपने अपने दिल की तरंगो को बस में कर लिया तो समझो की आपकी हर समस्या का हल हो जाएगा. क्योंकि दिमाग तो हमारे दिल में उठने वाली हलचलों का गुलाम है. दिल थोड़ा सा धड़का क्या कि दिमाग ने अपनी जासूसी शुरू कर दी. जैसे कि सचमुच में कोई भूत मेरे पीछे लगा तो है, या कही सही में कोई बस्तु दोष तो नही मेरे घर में .. वगैरह वगैरह.. उधर दिल बिचारा शांत हो गया लेकिन दिमाग कि खुफियागिरी चलती रही. इसीलिए मित्रो सबसे पहले तो दिल को कंट्रोल में करो फ़िर दिमाग को. हमारा दिमाग घोड़ा है तो दिल उसका लगाम. अब देखो न बुडापे में क्या होता है, दिल यानि हमारा लगाम तो उम्र के साथ कमजोर हो गया वही दिमाग रूपी घोड़ा बिना कंट्रोल के हो गया. तो मेरा कहना यह है कि समस्याएं तो हमारे जीवन का हिस्सा है. वास्तविक जीवन में समस्याएं उतनी बड़ी और उतनी लम्बी नही होती, जितनी हमारे दिमाग रुपी बेलगाम घोडे ने पैदा कर दी. इसी बेलगाम घोडे के चलते हम पहुच जाते है तथा कथित धन उगाऊ बाबावों के शरण में. जो हमारे संकट को काम तो नही करते , लेकिन हमारे आर्थिक संकट के लिए शनि ग्रह बन जाते है. हम दो वक्त खाना भले ही न खा पायें , बाबाजी के लिए लजीज पकवान जरूर पहुचाने लगते है. हम रहने के लिए घर भले ही न बनवा पाए, लेकिन बाबाजी के कहने पे अपना बना बनाया घर तुड़वा जरूर देते है. अरे भाई घर तुड़वा देने से आपका ही नुकशान है. सबसे बड़ा शत्रु तो आपका जो बेलगाम घोड़ा यानि दिमाग जो आपको बाबावों के पास ले जा रहा है, उसपे नियंत्रन रखो. बाबा शरद स्नेही " उग्र"
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सबसे बड़ा कौन इन्सान या उसकी इच्छा शक्ति ?
भारत की बर्तमान व्यवस्था में एक सवाल पूछा जाए की सबसे बड़ा कौन? तो शायेद आपका रटा रटाया जवाब होगा... भारत का रास्ट्रपति... अथवा भारत का सबसे बड़ा कोई बहुत प्रतिष्ठित उद्योगपति... वगैरह वगैरह.. कल अचानक मेरे एक मित्र ने पूछा यही सवाल कि भाई तुम क्या सोचते हो? मै भी हैरान होगया कि भाई राजनैतिक रूप से तो रास्ट्रपति सबसे बड़ा होगा अथवा आर्थिक रूप से भारत के कुछ बड़े उद्योगपति जैसे लक्ष्मी मित्तल या अम्बानी बड़े होगे .. लेकिन दोस्त सच में इन्सान की इच्छा शक्ति से बड़ा कोई नही ... अगर बिस्वास नही होता तो आप भारत के अतीत से लेकर बर्तमान तक झांक कर देख लो.. जो आज देश में शिर्सस्थ है, वे भी हमारी तरह कभी सामान्य जन थे, बहुत सामान्य घर में पैदा हुवे, सामान्य ढंग से उन्होंने जिंदगी कि सुरुवात कि. हा एक चीज जो उनमे अलग थी वह थी , उनके सोचने और उसको अमल करने की शक्ति . हम आप भी बहुत सवालो के जवाब बहुत अच्छी तरह से दे लेते है, बहुत सी चीजो को हम भी कई बार बहुत अच्छी तरह से संभाल लेते है. लेकिन अपनी इच्छा शक्ति और मन की भावनाओ पर सामान रूप से अंकुश नही रख पाते है. हम बहुत ही बार अच्छे निर्णय लेते है, लेकिन उन आदर्शो और विचारो को लगातार अपने जीवन में बनाये नही रख पाते है. हमारे जीवन का , हमारे भविष्य का दर्पण है हमारा मस्तिस्क , जिसमे हम जैसे विचारो को जन्म देते है, लगभग धीरे धीरे वैसे ही हम समय के साथ बनते जाते है. हमारी ही विचारधाराये हमारे भीतर भीतर ऐसे वातावरण पैदा करती है, की हमारा सम्पूर्ण परिवर्तन होने लगता है. हमारी विचार धाराए हमारे भीतर इच्छा शक्ति रुपी बवंडर पैदा कर देती है. यह बवंडर समय के साथ साथ इतना शक्तिशाली हो जाता है, कि हमारा समान्यापन हमें बहुत ही सामान्य से बहुत ही असामान्य बना देता है. लेकिन पुरी प्रक्रिया के पूर्ण होने में काफी समय लगता है. साथ ही साथ हमारी तात्कालिक परिस्थितिया भी हमें प्रभावित करती है, कि हमने कितनी इच्छाशक्ति को एक बिशेष दिशा में बहने दिया है. फ़िर यही समय हमारे सही संकल्पों के पौधे को एक दिन इतने विशाल पेड़ में बदल देता है कि पूछो मत. इसीलिए मै तो कहूँगा कि सबसे बड़ा हमारा चिंतन शक्ति केन्द्र है. इसी चिंतन शक्ति केन्द्र के प्रभाव से चाहे तो कोई दुनिया कि बड़ी हस्ती बन जाए या समाज का सबसे बड़ा नकारा. तो मित्रो मेरी बात मानो. आज से ही सही संकल्प और सही चिंतन करना शुरू करो, जिससे कि आप भी अपने लक्ष्य तक पहुच सको. आपका बाबा शरद स्नेही "उग्र "
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उत्तिस्ठ भारत
मित्र भगवंत और विजयंत जी .. आज आपकी रचनाये पढ़ी , मुझे पहली बार एहसास हुआ कि आज भी हिंदुस्तान की युवा पीढी में देशभक्ति के जज्बे कम नही हुवे है. सिर्फ़ उसपे वक्त ने एक मोटी चादर डाल दी है. आज भी हमारे देश के युवा उत्साह और संवेदना से भरपूर है. सिर्फ़ उस चादर को हटा कर हमें देखने कि जरूरत है. और आज यह चादर पूरे हिंदुस्तान से उठाना बहुत जरूरी हो गया है, नही तो हमारे देश के अवशर वादी नेताओ ने देश को बाटने का पूरा इन्तेजाम कर के रखा है. बड़ा दुःख होता है, कि सैकड़ो साल के संघर्ष के बाद मिली आजादी एवं देश के विशाल स्वरुप को कितनी आसानी से क्षेत्रवाद ओर धर्म के विष वमन से लोगो की संवेदना की हत्या की जा रही है. काश भारत के लोग अपने अपने स्वार्थो से ऊपर उठ कर सोच पाते ओर देश को मजबूत बनाने में एक जुट हो जाते तो , इन गंदे खेल खेलने वाले ओर देश में नफ़रत की जहर फैलाने वाले नेताओ के हौसले पस्त होते. हम हजारो साल गुलामी की जंजीरों में रहने के बावजूद भी कितनी आसानी से जाति धर्म ओर क्षेत्र के नाम पर बट अपने ही लोगो के खून के प्यासे हो जाते है, ओर अपने ही देश को कमजोर बनाने की कोशिस करते है, यह हमें कब समझ में आएगा. कब पूरा भारत एक होकर उन नफ़रत फैलाकर देश को बाट कर हमारे ऊपर शासन करने वालो को जवाब देगा की हम तुम्हारे इरादों को पहचान गए है, ओर अब भारत को ओर विभाजित होने नही देंगे. उत्तिस्ठ भारत उठो भारत के नवजवानों आज देश को लहूलुहान करने वाले लोगो के मन्सो को कुचल दो. जय हिंद जय अखंड भारत शरद स्नेही " उग्र"
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सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ता बना रहे,
देखता हूँ ,जब अपने जहाँ को , बस रहती यही आरजू मेरी दिलो में हर एक प्रेम भावः सजता रहे सबके सुर एक हो, और सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ता बना रहे, क्यो हो जाति - धरम पर मानवों के बटवारे क्यो हो राजनीती के लिए मानवता के वारे न्यारे कब तक आतंक का कहर आखिर युही हर एक को नंगे होकर ड्षता रहेगा कब तक आदमी अपने ही लोगो के चिथडो को बटोर ढोता रहेगा कब तक सुलगती रहेगी ये असमय ही अपने ही जन की चिताए कब तक बनेगी हमारी बहने असमय बेवाये कब तक होते रहेंगे मासूम असमय अनाथ कब तक ये बूढे माँ बाप रोये और चिल्लाये क्यो नही समझता यह हर एक आदमी दीवारे नही होती कोई हल जब, आदमी के दिलो के बीच दीवारे और नफ़रत जगह ले लेती है, और दे दो उन्हें कितनी बड़ी धरती हर सीमा उन्हें छोटी होती है, इन्सान का दिल तो सबसे बड़ा साम्राज्य होता है, जिसमे यदि प्रेम हो तो हर, एक को अपना बना लेता है, और सरहदों का क्या है, वे कितनी बार बनी बिगड़ी है पर आदमी नादान बना धरती की कुछ लकीरों को ही अपना सब कुछ मान लेता है, और धरती पर एक छोटी लकीर के लिए अपने दिल में एक बड़ी लकीर बना लेता है और दिल के प्यार के खजाने को आदमी के लिए नफ़रत की कब्रगाह बना लेता है,
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दीवाली पे सबको शुभ कामनाये
जगमग दीवाली के दियो की तरह जगमगाते रहे आप , ताउम्र युही और बिखेरते रहे अपनी मीठी मुस्कानों को बाटते रहे जीवन भर जीवन के सुमधुर पुष्प यु ही वैसे तो आंधियां आती रहेगी, काटे भी राहों में चुभने को मिलेंगे.. फ़िर भी दिए के लौ की तरह लचीले हो , आप झेल जाए हर मुस्किलो को, क्योकि जिंदगी का नाम ही मुस्करा के हर गम को पीना और नए सपनों को बुनना फ़िर जीवन की कठोर राहों चलते चलना है. और जिंदगी के लिए जिंदगी भर संघर्ष करते रहना है...
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जीवन में उजाला जरूरी है...
कुम्हलाते को फ़िर से हर्षित करने को जल की धारा जरूरी है, जब आशाये , गुम हो जाए, और जीवन से उत्साह ख़तम हो जाए , तब कुछ मीठे प्यार के दो बोल ही जरूरी है, और धुत्त अंधेरो की चादर को पिघलाने, खौफ की बढ़ती चादर को झुलसाने एक अकेले ही दिए की लौ जरूरी है, और तिमिर के प्रभाव को कम करने को थोड़ा सा ही उजाला जरूरी है..
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आज़ादी के रंग उतर गए
नयी फिजा में आज़ादी के रंग उतर गए, सपनो के पुष्प खिलने से पहले बिखर गए, मजहब कभी था जोड़ता दिलो को , उसके ही नाम पर आज कितने रातो रात घर उजड़ गए वों आँखे लगाये रखती थी टकटकी, जिन उम्मीद की राहों पे, उन राहों में हर तरफ़ आज नफ़रत के कांटे बिखर गए, नफ़रत के नासूर ने , दूर किया अपनों को, बाकी को देश के नेतागण निगल गए, बेहाल गरीब , आत्महत्या करते किसान, चारो तरफ़ है , हर आम आदमी परेशान , किसानो के देश में, रसूख वाले के लिए संबिधान बदल गए, अपराधी है शासन करता, बाकी गरीबो के लिए तो भगवान भी बदल गए.
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23:14 | 6/Aug/2008 | 3 | | | |