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rituraj ne...
जब से स्याह मौसम ने, रंगत क़ी अंगड़ाई ली है,
कुम्हलाए फूलो मे भी,
चाहत उमड़ने लगी है....
तितलियो ने लंबी डगर भरी है,
लतावो पे नयी कोपले भी
नयी सुर छेड्ने लगी है,
मूक भी नये सुर को
उन्मुक्त सा हो गुनगुनाने को मचल उठा है.
मौसम क़ी तरुणाई मे
मेघ मस्त हो चला है.
मोर भी मदहोश हो नाचने लगा है.
देख नज़ारे ऋतुराज क़ी
कविता निर्झर सी बह चली है,
जा कोयी बिरहन पी मिलन
को आतुर बावली सी हो चली है...
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