नयी फिजा में आज़ादी के रंग उतर गए,
सपनो के पुष्प खिलने से पहले बिखर गए,
मजहब कभी था जोड़ता दिलो को ,
उसके ही नाम पर आज कितने
रातो रात घर उजड़ गए
वों आँखे लगाये रखती थी टकटकी,
जिन उम्मीद की राहों पे,
उन राहों में हर तरफ़ आज
नफ़रत के कांटे बिखर गए,
नफ़रत के नासूर ने , दूर किया अपनों को,
बाकी को देश के नेतागण निगल गए,
बेहाल गरीब , आत्महत्या करते किसान,
चारो तरफ़ है , हर आम आदमी परेशान ,
किसानो के देश में, रसूख वाले
के लिए संबिधान बदल गए,
अपराधी है शासन करता,
बाकी गरीबो के लिए तो भगवान भी बदल गए.